Friday, July 25, 2008

बहुत देर में जब आंख लगी,
एक परी सपने में मिली,
बोली- मांग लो जो चाहिए,
जमीन के सारे फूल याआसमान के तारे,
सोचा क्या मांगू,
जमीन पर फूल बहुत कम हैंऔर आसमान में तारे,
मैंने कहा परी रानी गर देना ही हैतो कुछ ऐसा कर दो,
कम से कम जमीन केनन्हे सितारों में हास्य रस भर दो।
नन्हे मुरझाते चेहरों कोमुस्कान से रोशन कर दो,
मैंने बहुन दिनों सेनिश्चल हंसी नहीं सुनी,
खनखनाती घंटियों की चहक नहीं सुनी,
आए दिन की चिल्ल पौं में,
बचपन या तो रो रहा हैया फिर चुपचापटीवी के नक्शे कदम परचल रहा है,
ना नानी की कहानियां हैंना दादी के गीत,
बस एक मात्र टीवी ही है उनका मनमीत।

6 comments:

अर्चना तिवारी said...

Shusheel ji bahut sunder likha hai...

shikha varshney said...

shushil ji!
bahut pawan pavitr si rachna hai..

रचना गौड़ ’भारती’ said...

आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
रचना गौड़ ‘भारती’

Dr. Shreesh K. Pathak said...

va bhai is blog ke bare me to mujhe pata hi nahi tha

Dr. Shreesh K. Pathak said...

manmeet ko ab bhool jao,,,mitr

Parul kanani said...

bahut sundar1